Thursday, August 28, 2014

शाकाहारी बनो

कविता का एक एक शब्द गहराई से समझे।
गर्व था भारत-भूमि को
कि महावीर की माता हूँ।।
राम-कृष्ण और नानक- बुद्ध
जैसे वीरो की यशगाथा हूँ॥
कंद-मूल खाने वाले बुद्ध से
मांसाहारी भी डरते थे।।
पोरस जैसे शूर-वीर को
नमन 'सिकंदर' करते थे॥
चौदह वर्षों तक वन में
जिसका धाम था।।
मन-मन्दिर में बसने
वाला शाकाहारी राम था।।
चाहते तो खा सकते थे
वो मांस पशु के ढेरो में।।
लेकिन उनको प्यार मिला
' शबरी' के झूठे बेरो में॥
चक्र सुदर्शन धारी थे
गोवर्धन पर भारी थे॥
मुरली से वश करने वाले
'गिरधर' शाकाहारी थे॥
पर-सेवा, पर-प्रेम का परचम
चोटी पर फहराया था।।
निर्धन की कुटिया में जाकर जिसने मान बढाया था॥
सपने जिसने देखे थे
मानवता के विस्तार के।।
नानक जैसे महा-संत थे
वाचक शाकाहार के॥
उठो जरा तुम पढ़ कर
देखो गौरवमयी इतिहास को।।
आदम से गाँधी तक फैले
इस नीले आकाश को॥
दया की आँखे खोल देख लो
पशु के करुण क्रंदन को।।
इंसानों का जिस्म बना है
शाकाहारी भोजन को॥
अंग लाश के खा जाए
क्या फ़िर भी वो इंसान है?
पेट तुम्हारा मुर्दाघर है
या कोई कब्रिस्तान है?
आँखे कितना रोती हैं
जब उंगली अपनी जलती है।।
सोचो उस तड़पन की हद
जब जिस्म पे आरी चलती है॥
बेबसता तुम पशु की देखो
बचने के आसार नही।।
जीते जी तन काटा जाए,
उस पीडा का पार नही॥
खाने से पहले बिरयानी,
चीख जीव की सुन लेते।।
करुणा के वश होकर तुम भी शाकाहार को चुन लेते॥
शाकाहारी बनो...!

क्या आज की नारी स्वतंत्र और सशक्त है?

बहुत अच्छा लगता है, जब टीवी चलाते ही सामने एक सुन्दर सी बाला स्वागत करती हुई दिखाई दे जाती है. मन कोल्ड ड्रिंक पीने को मचल उठता है, जब एक विश्व सुंदरी अपने सुन्दर होठों से लगाये हुए कहती है, ‘पियो सर उठा के’. और समाचार और भी आकर्षक लगने लगते हैं, जब उन्हें कोई दमकता चेहरा, सुरीली आवाज में सुना रहा होता है.

साथ ही साथ मैं इस सुखद भ्रम में भी डूब जाता हूँ, कि स्त्री सच में सशक्त हो रही है. आज कोई कोना नहीं बचा, जहाँ स्त्री ने अपनी उपस्थिति ना दर्ज की हो.

ऐसे ही एक सुखद भ्रम में खोया, टीवी पर बोल रही बाला को सुन ही रहा था, कि अचानक ठिठक सा गया. एक अर्धनग्न सी युवती, समंदर किनारे किसी बंद, पानी की बोतल का प्रचार कर रही थी. मैं उसकी अवस्था को देखकर हतप्रभ था. समझ नहीं पा रहा था, कि यह कौन से ‘पानी’ का प्रचार है..!!? क्या यह सच में उसी ‘पानी’ का प्रचार है, जो उस बोतल में बंद है, या फिर यह उस ‘पानी’ का प्रचार है, जो इस ‘पानी’ की आड़ में ‘पानी-पानी’ कर दिया गया.

यह कैसी सशक्तता है? क्या स्त्री इसी सशक्तता के लिए बेचैन थी? क्या यही प्राप्ति उसका अंतिम लक्ष्य है?

एक कटु सत्य यही है कि स्त्री आज भी सशक्त नहीं है, बल्कि वह पुरुष के हाथों सशक्तता के भ्रम में पड़कर स्वयं को छल रही है.

‘हे विश्वसुन्दरी, तुमने क्या खोया, क्या पाया है…

तन को बाजारों में बेचा, फिर तुमने क्या कमाया है….’

स्त्री देह के छोटे होते वस्त्र और उसकी सुन्दरता को मिलते बड़े पुरस्कार…...यह सब एक रणनीति रही है, इस पुरुष समाज की…स्त्री को छलने के लिए….दुर्भाग्य यही है, कि स्त्री स्वयं को उन्ही बड़े पुरस्कारों के आधार पर जांचने लगी. स्त्री को अपनी सुन्दरता का प्रमाण उन पुरस्कारों में दिखाई देने लगा…

जिस स्त्री को अपने आभूषणों में सुन्दरता दिखती थी, उसे अब अपनी अर्धनग्न देह ज्यादा सुन्दर लगने लगी. और रही बात पुरुष समाज की, तो वह तो सदा से यही चाहता रहा है. जो यह समाज तमाम अत्याचारों और बल के बाद भी नहीं कर पाया था, कुछ बुद्धिजीवियों ने इतनी सरलता से उसे कर दिखाया, कि स्त्री स्वयं ही अपने वस्त्र उतार बैठी.

कन्हैया सोच रहे हैं, कि शायद कोई द्रौपदी अपने चीर की रक्षा के लिए आवाज देगी… लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है, क्योंकि यहाँ कोई दुशासन चीर हरण कर ही नहीं रहा है, यहाँ तो अब स्वयं द्रौपदी ही अपने चीर को त्याग रही है, तब फिर भला कन्हैया भी क्या करें?

सरकार की दृष्टि में सशक्तता का प्रमाणपत्र अब बार या पब में जाकर ही मिल सकता है. यह सब कुछ मात्र राजनीति का हिस्सा नहीं है. यह एक बहुत बड़ी रणनीति है, समाज के अन्दर से मनुष्यता और संस्कृति को मारने की.

पिछले दशक में अचानक ही हिन्दुस्तानी सुंदरियों को विश्व-सुंदरी और ब्रह्माण्ड-सुंदरी का ताज मिलने के पीछे उनकी सुन्दरता को पुरस्कृत करने का ध्येय कदापि नहीं था. इसके पीछे खेल था, यहाँ से संस्कृति को पुरस्कारों के जरिये ख़त्म कर देने का. और वह इसमें सफल भी रहे. अब हर रोज कहीं न कहीं गली-सुंदरी, मोहल्ला-सुंदरी, और पार्टी-सुंदरी के ताज मिलते रहते हैं.

स्त्री की सुन्दरता के दृष्टिकोण को बदल दिया गया. अब ‘न्यूनतम वस्त्र, अधिकतम आधुनिक सुन्दरता’ के द्योतक बना दिए गए.चलचित्रों (फिल्मों) का कैमरा अब अभिनेत्री की ‘कजरारी आँखों’ से उतर कर, उसकी ‘बलखाती कमर’ पर टिक चुका है. अब अभिनेता-अभिनेत्री की मुलाकात किसी बगीचे में, पेडों की ओट में नहीं, बल्कि समंदर किनारे किसी ‘बीच-पार्टी’ में होती है. जहाँ स्विमसूट में अभिनेत्री का एक दृश्य आवश्यक हो गया है.

दुर्भाग्य से स्त्री इसे ही अपनी स्वतंत्रता और सशक्तता का पैमाना मानने लगी है.

समय रहते स्त्री को इस अवधारणा से बाहर निकल कर अपनी सर्वोच्चता और पूर्णता की प्राप्ति के लिए प्रयास शुरू करना होगा. जिस दिन हर स्त्री अपनी पूर्णता को स्वीकार कर अपूर्ण पुरुष की समानता के भ्रमजाल से बाहर आ जायेगी, वह पूर्ण स्वतंत्र और सशक्त हो उठेगी. तब कोई दुसाशन ना चीर हरण का प्रयास करेगा, ना ही कृष्ण को चीर बचाने की चिंता होगी……

आखिर कृष्ण के लिए और भी तो काम हैं….

Tuesday, June 24, 2014

शिर्डी साईं- भारत के इतिहास का सबसे बड़ा पाखंड।


साईं के बारे में अब तक का सबसे बड़ा खुलासा :
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पिण्डारी डाकू साईं की असली कहानी और उसके द्वारा हिन्दुओ के खिलाफ जिहाद फैलाने के षड्यंत्र का भांडाफोड़

पिछले दिनों मेरे एक मित्र ने शिर्डी साईं के बारे में बहुत सी जानकारी इकठ्ठा की और मुझे बताया की साईं असल में क्या है कहा से आया, जन्म मरण और फिर इतना लम्बे समय बाद उसका अचानक भगवान बन कर निकलना,

ये सब कोई संयोग नहीं सोचा समझा षड्यंत्र है,
ब्रिटेन की ख़ुफ़िया एजेंसी MI5 जी हाँ मित्रो, एक ब्रिटिश एजंसी ने श्री राम मंदिर आन्दोलन के बाद अचानक साईं की भक्ति में तेजी देखि, वैसे ब्रिटेन और शिर्डी के साईं का रिश्ता बहुत ही गहरा है क्युकी ये साईं वही है जो 1857 की क्रांति में कुछ लूटेरो के साथ पकड़ा गया था, और वह अहमदनगर में पहली बार साईं की फोटो ली गयी थी, जिसे मैं जल्दी ही आप सभी के सामने पेश करूँगा

MI5 ब्रिटेन की ख़ुफ़िया एजेंसी है , साईं का पूरा इतिहास खोज निकलने में इस एजंसी का महत्वपूर्ण योगदान है, साईं का जन्म 1838में हुआ था, पर कैसे हुआ और उसके बाद की पूरी कथा बहुत ही रोचक है,

साईं के पिता का असली नाम था बहरुद्दीन, जो की अफगानिस्तान का एक पिंडारी था, वैसे इस पर एक फिल्म भी आई थी जिसमे पिंडारियो को देशभक्त बताया गया है, ठीक वैसे ही जैसे गाँधी ने मोपला और नोआखली में हिन्दुओ के हत्यारों को स्वतंत्रसेनानी कहा था,
औरंगजेब की मौत के बाद मुग़ल साम्राज्य ख़तम सा हो गया था केवल दिल्ली उनके

आधीन थी, मराठा के वीर सपूतो ने एक तरह से हिन्दू साम्राज्य की नीव रख ही दी थी, ऐसे समय में मराठाओ को बदनाम करके उनके इलाको में लूटपाट करने का काम ये पिंडारी करते थे, इनका एक ही काम था लूत्पार करके जो औरत मिलती उसका बलात्कार करना, आज एक का बलात्कार कल दूसरी का, इस तरह से ये मराठाओ को तंग किया करते थे, पर समय के साथ साथ देश में अंग्रेज आये और उन्होंने इन पिंडारियो को मार मार कर ख़तम करना शुरू किया,

साईं का बाप जो एक पिंडारी ही था, उसका मुख्य काम था अफगानिस्तान से भारत के राज्यों में लूटपाट करना, एक बार लूटपाट करते करते वह महाराष्ट्र के अहमदनगर पहुचा जहा वह एक वेश्या के घर रुक गया, उम्र भी जवाब दे रही थी, सो वो उसी के पास रहने लग गया, कुछ समय बाद उस वेश्या से उसे एक लड़का और एक लड़की पैदा हुआ, लड़के का नाम उसने चाँद मियां रखा और उसे लेकर लूट पात करना सिखाने के लिए उसे अफगानिस्तान ले गया,

उस समय अंग्रेज पिंडारियो की ज़बरदस्त धर पकड़ कर रहे थे इसलिए बहरुद्दीन भेस बदल कर लूटपाट करता था उसने अपने सन्देश वाहक के लिए चाँद मिया को रख लिया,
चाँद मिया आज कल के उन मुसलमान भिखारियों की तरह था जो चादर फैला कर भीख मांगते थे, जिन्हें अँगरेज़ blanket bagger कहते थे, चाँद मिया का काम था लूट के लिए सही वक़्त देखना और सन्देश अपने बाप को देना, वह उस सन्देश को लिख कर उसे चादर के निचे सिल कर हैदराबाद से अफगानिस्तान तक ले जाता था, पर एक दिन ये चाँद मियां अग्रेजो के हत्थे लग गया और उसे पकडवाने में झाँसी के लोगो ने अंग्रेजो की मदद की जो अपने इलाके में हो रही लूटपाट से तंग थे

उसी समय देश में पहली आजादी की क्रांति हुई और पूरा देश क्रांति से गूंज उठा, अंग्रेजो के लिए विकत समय था और इसके लिए उन्हें खूंखार लोगो की जरुरत थी, बहर्दुद्दीन तो था ही धारण का लालची, सो उसने अंग्रेजो से हाथ मिला लिया और झाँसी चला गया, वह उसने लोगो से घुलमिल कर झाँसी के किले में प्रवेश किया और समय आने पर पीछे से दरवाजा खोल कर रानी लक्ष्मी बाई को हारने में अहम् भूमिका अदा की,

यही चाँद मिया आठ साल बाल जेल से छुटकर कुछ दिन बाद शिर्डी पंहुचा और वह के सुलेमानी लोगो से मिला जिनका असली काम था गैर मुसलमानों के बिच रह कर चुपचाप इस्लाम को बढ़ाना| चाँद मियां ने वही से अल तकिया का ज्ञान लिया और हिन्दुओ को फ़साने के लिए साईं नाम रख कर शिर्डी में आसन जमा कर बैठ गया, मस्जिद को जानबूझ कर एक हिन्दू नाम दिया और उसके वहा ठहराने का पूरा प्रबंध सुलेमानी मुसलमानों ने किया, एक षड्यंत्र के तहत साईं को भगवान का रूप दिखाया गया और पीछे से ही हिन्दू मुस्लिम एकता की बाते करके स्वाभिमानी मराठाओ को मुर्दा बनाने के लिए उन्हें उनके ही

असली दुश्मनों से एकता निभाने का पाठ पढाया गया
पर पीछे ही पीछे साईं का असली मकसद था लोगो में इस्लाम को बढ़ाना, इसका एक उदाहरण साईं सत्चरित्र में है की साईं के पास एक पोलिस वाला आता है जिसे साईं मार मार भगाने की बात कहता है,

अब असल में हुआ ये की एक पंडित जी ने अपने पुत्र को शिक्षा दिलवाने के लिए साईं को सोंप दिया पर साईं ने उसका खतना कर दिया जब पंडित जी को पता चला तो उन्होंने कोतवाली में रिपोर्ट कर दी, साईं को पकड़ने के लिए एक पुलिस वाला भी आया जिसे साईं ने मार कर भगाने की बात कही थी,
ये तभी की फोटो है जब पुलिस वाला साईं को पकड़ने गया था और साईं बुरका पहन कर भागा था
शेयर करे और इस जिहादी साईं की असली सच्चाई सभी को बताये  l

Admin
मेरा साई बाबा से कोई
निजी दुष्मनी नही है ।

परतुं हिन्दू धर्म को नाश हो रहा है, इसलिए मै
कुछ सवाल करना चाहता हू,
हिन्दू धर्म एक सनातन धर्म है, लेकिन लोग
आज कल लोग इस बात से परिचित नही है क्या
जब भारत मे अंग्रेजी सरकार अत्याचार , और
और सबको मौत के घाट उतार रहे थे तब साई बाबा ने

कौन से
ब्रिटिश अंग्रेजो के साथ आंदोलन
किया ? जिदंगी भिख मांगने मे कट गई?
मस्जिद मे रह कर कुरान पढना जरूरी था.
बकरे हलाल करना क्या जरूरी था ?
सब पाखंड है, पैसा कमाने का जरिया है।
ऐसा कौन सा दुख है कि उसे भगवान दूर नही
कर सकते है, श्रीमतभगवत
गीता मे लिखा है कि
श्मशान और समाधि की पुजा करने वाले मनुष्य
राक्षस योनी को प्राप्त होते है

साई जैसे पाखंडी की आज इतनी ज्यादा मार्केटिंग हो गयी है कि हमारे हिन्दू भाई बहिन आज अपने मूल धर्म से अलग होकर साई मुल्ले कि पूजा करने लगे है। आज लगभग हर मंदिर में इस जिहादी ने कब्जा कर लिया है। हनुमान जी ने हमेशा सीता राम कहा और आज के मूर्ख हिन्दू हुनमान जी का अपमान करते हुए सीता राम कि जगह साई राम कहने लगगए । बड़ी शर्म कि बात है। आज जिसकी मार्केटिंग ज्यादा उसी कि पूजा हो रही है। इसी लिए कृष्ण भगवान ने कहा था कि कलयुग में इंसान पथ और धर्म दोनों से भ्रष्ट हो जाएगा। 100 मे से 99 को नहीं पता साई कौन था इसने कौन सी किताब लिखी क्या उपदेश दिये पर फिर भी भगवान बनाकर बैठे है।

साई के माँ बाप का सही सही पता नहीं पर मूर्खो को ये पता है कि ये किस किस के अवतार है। अंग्रेज़ो के जमाने मे मूर्खो के साई भगवान पैदा होकर मर गए पर किसी भी एक महामारी भुखमरी मे मदद नहीं की। इनके रहते भारत गुलाम बना रहा पर इन महाशय को कोई खबर नहीं रही। शिर्डी से कभी बाहर नहीं निकले पर पूरे देश मे अचानक इनकी मौत के 90-100 साल बाद इनके मंदिर कुकरमूतते की तरह बनने लगे। चालीसा हनुमान जी की हुआ करती थी आज साई की हो गयी। राम सीता के हुआ करते थे। आज साई ही राम हो गए। श्याम राधा के थे आज वो भी साई बना दिये गए। ब्रहस्पति दिन विष्णु भगवान का होता था आज साई का मनाया जाने लगा। भगवान की मूर्ति मंदिरो में छोटी हो गयी और साई विशाल मूर्ति मे हो गए।

प्राचीन हनुमान मंदिर दान को तरस गए और साई मंदिरो के तहखाने तक भर गए। मूर्ख हिन्दुओ अगर दुनिया मे सच मे कलयुग के बाद भगवान ने इंसाफ किया तो याद रखना मुह छुपाने के लिए और अपनी मूर्ख बुद्धि पर तरस खाने के लिए कही शरण भी न मिलेगी। इसलिए भागवानो की तुलना मुल्ले साई से करके पाप मत करो। और इस लेख को पढ़ने के बाद भी न समझ मे आए तो अपना खतना करवाके मुसलमान बन जाओ।

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Friday, June 20, 2014

साईं भक्ति यानी भक्ति जिहाद।

सीधा सा प्रशन साईं के भगवान् होने का सबूत किस ग्रन्थ में है, सीधा जवाब दे...
साईं सत्चरित्र में कही नहीं लिखा की साईं भगवान् श्री राम के भक्त थे या उनका नाम जपते थे?? तो साईं के भक्त साईं राम क्यों कहते है ?
शिर्डी साईं बाबा संत है या भगवान्??? अगर भगवान् है तो कहाँ लिखा है, अगर संत है तो क्या एक संत को भगवान् की तरह पूजना ठीक है?
साईं बड़ा या राम, अगर राम से बड़ा राम का नाम तो उनके साथ एक यवनी(मुसलमान) का नाम क्यों जोड़ा जा रहा है?
कोई कहता है शिर्डी साईं शिव का अवतार, कोई कहता है राम जी का भक्त, कुछ दत्तात्रेय का अवतार कहते है, क्या कोई बता सकता है की ऐसा कंफ्यूजन क्या श्री राम या श्री कृष्ण के बारे में है ?
हमने राम नाम पैदा होते ही सुना है, पर साईं का नाम आपने कब सुना?
कृपया इमानदारी से बताये. साईं सत्चरित्र लिखने वाले लेखक श्री गोबि द राव रघुनाथ दाभोलकर (हेमाडपंत) हिन्दू थे मुसलमान?
शिर्डी के साईं बाबा उर्फ़ चाँद मियां उर्फ़ अब्दुल रहीम, ये हिन्दू थे या मुस्लिम?
कोई शिर्डी साईं को संत कह रहा है, कोई राम जी का भक्त तो कोई शिव का अवतार, जिसके बारे में सही से नहीं पता उसे लोग क्यों जबरदस्ती भगवान् बना रहे है?
क्या आप साईं भक्त है, अगर हाँ तो आपके लिए मांस खाना अनिवार्य है, क्यूंकि साईं बाबा प्रसाद में मांस मिलाते थे और भक्तो को बाँटते थे..
हम गुरुवार(ब्रहस्पतिवार)को किस देवता की पूजा करते हैं?
साईं सत्चरित्र में साफ़ साफ़ लिखा है की सब केवल अल्लाह मालिक बोलता था, कही भी ये वर्णित नहीं है की साईं ने ॐ बोला या राम, फिर साईं के मुर्ख भक्त ॐ साईं राम क्यों बोलते है, क्यों एक यावनी, मुसलमान को ज़बरदस्ती हिन्दू बनाने का एक घोर षड्यंत्र चल रहा है ?
साईं भक्त स्पष्ट करे, वो भी प्रमाण के साथ गीता में भगवान् कृष्ण कहते है की कलयुग में धर्म के अर्थ ही बदल जायेंगे, अब तक जहा केवल धर्म और अधर्म होता था कल्युग में धर्म तो रहेगा पर अधर्म भी स्वयं को धर्म कहेगा और हजारो धर्म बन जायेंगे साथ ही ऐसे दुष्ट लोग भी होंगे जो स्वयं को भगवान् और इश्वर कहेंगे, पर मैं ही इश्वर हु, मैं ही परब्रह्म हु और मैं ही सत्य हु, मुझे में सर्व्व्यपर्क और सब कुछ मुझसे ही उत्पन्न होता है और मुझमें समां जाता है, दूसरी तरफ शिर्डी के साईं बाबा जो साईं सत्चरित्र में हर जगह केवल अल्लाह मालिक कहते है, अब ये अल्लाह कौन है कोई साईं भक्त बतायेगा, क्या अल्लाह को मालिक कहना ये हमारे भगवान् श्री कृष्ण का अपमान नहीं है ?

ऐसे में आप बताये साईं सच्चा है या भगवान् कृष्ण, सच्चा तो एक ही होगा न इनमे से,,, साँईँ के चमत्कारिता के पाखंड और झूठ का ता चलता है, उसके "साँईँ चालिसा" से। आईये पहले चालिसा का अर्थ जान लेते है:- "हिन्दी पद्य की ऐसी विधा जिसमेँ चौपाईयोँ की संख्या मात्र 40 हो, चालिसा कहलाती है।" क्या आपने कभी गौर किया है?.

कि साँईँ चालिसा मेँ कितनी चौपाईयाँ हैँ?  यदि नहीँ, तो आज ही देखेँ.... जी हाँ, कुल 100 or 200. तनिक विचारेँ क्या इतने चौपाईयोँ के होने पर भी उसे चालिसा कहा जा सकता है? नहीँ न?..... बिल्कुल सही समझा आप.... जब इन व्याकरणिक व आनुशासनिक नियमोँ से इतना से इतना खिलवाड़ है, तो साईँ के झूठे पाखंडवादी चमत्कारोँ की बात ही कुछ और है! कितने शर्म की बात है कि आधुनिक विज्ञान के गुणोत्तर प्रगतिशिलता के बावजूद लोग साईँ जैसे महापाखंडियोँ के वशिभूत हो जा रहे हैँ॥ हिन्दुओ का सबसे बड़ा खतरा भी मोमिनो यानि मुसलमानों से है !  करोडो हिन्दू अपना माथा एक मोमिन की ह चौखट पर रगड रहे है !  शिर्डी वाले साईं महाराज एक मोमिन है ! " गोपीचंदा मंदा त्वांची उदरिले ! मोमिन वंशी जन्मुनी लोंका तारिले !" ( शिर्डी साईं मंदिर की तथाकथित "आरती का अंश ") क्या ये सब बाते आप को मालूम नहीं है ? या सब कुछ जानते हुए भी अपने सनातन धर्म के साथ एक मोमिन का नाम जुड़ना देखना चाहते है ? 

कल की ही एक घटना है, सत्य, इसमें मिलावट कुछ नहीं है,, कल मैं सुबह ऑफिस जा रहा था, रास्ते में एक मंदिर है जिसकी दिवार पर भगवानो की फोटो वाली टाइल्स लगी हुई है, मैंने देखा की एक आदमी आगे जा रहा था और वो केवल साईं के आगे झुका और चल दिया बाकी किसी भी सनातनी भगवान् के आगे उसने सर नहीं झुकाया, वो थोडा और आगे गया और एक और साईं की टाइल को छुआ और आगे फिर यही करता रहा, तीन टाइल छूने के बाद मैं भाग कर उसके पास गया और पूछा आपने साईं को प्रणाम किया पर बाकी अपने भगवानो को क्यों नहीं, उन्होंने कहा की अपनी अपनी श्रद्धा है, मैंने कहा वाह श्रद्धा में भी भेदभाव, फिर मैंने उनसे पूछा आपने साईं सत्चरित्र पढ़ी है, उन्होंने कहा नहीं, मैंने कहा पढ़िए और 22, 23 और 38 अध्याय जरुर पढ़े, उसे पढने के बाद मेरा विश्वास ह ै की आप साईं को भगवान् मानना बंद कर देंगे, अब वो महाशय आगे तो बढे पर आगे साईं की किसी टाइल को नहीं छुआ, ये है समझदार इंसान की पहचान जो पहले विश्लेषण करता है,,, अगर कोई मुर्ख होता तो वही मुझे पकड़ लेता और,,,,

साँई के अन्धभक्त अंधश्रध्दा मेँ डूबकर कहते हैँ कि "साँईं न तो हिन्दू हैँ और न ही मुस्लिम"। परन्तु वे इस बात का प्रत्य त्तर तो देँ:- 'श्री साँई बाबा संस्थान विश्वस्त व्यवस्था' से प्रकाशित साँईँ के जीवन की एकमात्र प्रामाणिक पुस्तक "साँईं सत्चरित्र" के 'अध्याय 28' के पृष्ठ 197 पर स्पस्ट वर्णन है कि..... {वे गर्जन कर कहने लगे की इसे बाहर निकाल दो, फिर मेधा की ओर देखकर साँईँ यह कहने लगे कि 'तुम तो एक उच्च कुलीन ब्राह्मण हो और मैँ एक निम्न जाति का एक यवन(मुसलमान) } अर्थात्‌ यहाँ साँईं स्वयं का मुसलमान होना कबूल करता है। साईं सत्चरित्र में कही भी ऐसा नहीं लिखा है की साईं बाबा ॐ जपते थे ये राम का नाम लेते थे, तो फिर साईं के भक्त ॐ साईं राम क्यों लिखते है या बोलते है, यही नहीं साईं सत्चरित्र में १४ जगह पर साईं ने कहा अल्लाह मालिक, साथ ही वे कहते थे सबका मालिक एक, और उसके कहने के दो चार सेकंड बाद ही कहते थे अल्लाह मालिक, तो आखिर क्यों उन्हें सनातन धर्म में जबरदस्ती घुसाया जा रहा है ?

कौन सी है वो ताकते जो हमारे ही धर्म को दूषित कर रही है ?  मैंने अधिकतर साईं भक्तो को देखा है जो शिर्डी साईं की अंधभक्ति करते है, पर ऐसे अंधभक्तो को एक आँख खोलने वाला उपाय बता रहा, कृपया करके आप साईं सत्चरित्र जरुर पढ़े तीसरे अध्याय तक आप साईं को मानना ही छोड़ देंगे यदि आप शाकाहारी है, अगले अध्यायों में आप 22, 23 और 38 अध्याय पढ़ कर तो बस क्या कहू, अगर बुद्धि होगी और दिमाग की बत्ती जल होगी तो इस साईं नाम के राक्षस को अपने जीवन से निकल कर बाहर फेंक देंगे और बकियों को भी बचाने की सोचेंगे, पर अगर मुर्ख होंगे तो ही आप साईं ही भक्ति करेंगे, आज के समय में हिन्दुओ के पतन का सबसे बड़ा कारण साईं ही है, इसलिए जितने भी साईं भक्त है उनसे मेरी प्रार्थना है की साईं सत्चरित्र अवश्य पढ़े,,, ये आपकी अंधश्रद्धा नहीं बल्कि आपके लाखो साल पुराने सनातन धर्म के अस्तित्व का प्रशन है जो आपकी मुर्खता के कारण पतन की और जा रहा है, अगर आप अब भी नहीं संभले तो आपके आने वाली संताने खतना करा कर नमाज पढ़ती नजर आयेंगी,, इसलिए पढ़े और जागे..... असतो मा सद्गमयः तमसो मा ज्योतिर्गमयः (हे परमेश्वर! हमेँ बुराई से अच्छाई, व अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो)

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जैसे सूर्य आकाश में छिपकर नहीं रह सकता, वैसे ही मार्ग दिखलाने वाले महापुरुष भी संसार में छिप कर नहीं रह सकते। वेदव्यास (महाभारत, वनपर्व)) यान्ति देवव्रता देवान् पितृन्यान्ति पितृव्रताः भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपिमाम् गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भूत प्रेत, मूर्दा (खुला या दफ़नाया हुआ अर्थात् कब्र अथवा समाधि) को सकामभाव से पूजने वाले स्वयं मरने के बाद भूत-प्रेत ही बनते हैं. जैसे की ये साईं

Jai Hind...

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