Sunday, April 6, 2014

मच्छर भगाने के देसी तरीके।

मित्रो मच्छर भगाने के लिए आप
अक्सर घर मे अलग अलग दवाएं इस्तेमाल
करते हैं ! कोई तो liquid form मे
होती हैं ! और कोई कोई coil के रूप
मे और कोई छोटी टिकिया के रूप
मे !! और all out ,good night,
baygon,hit जैसे अलग-अलग नामो से
बिकती है !
इन सबमे जो कैमिकल इस्तेमाल
किया जाता है !
वो डी एथलीन है मेलफो क्वीन है
और फोस्टीन है !! ये तीन खतरनाक
कैमिकल है ! और ये यूरोप मे 56 देशो मे
पिछले 20 -20 साल बैन है !और हम
लोग घर मे छोटे छोटे बच्चो के ऊपर
ये लगाकर छोड़ देते हैं ! 2-3 महीने
का बच्चा सो रहा होता है !
और साथ मे ये जहर जल
रहा होता है !!TV
विज्ञापनो ने आम
आदमी का दिमाग पूरा खराब
कर दिया है !
वैज्ञानिको का कहना है ये मच्छर
मारने वाली दवाए कई कोई
बार तो आदमी को ही मार
देती हैं !! इनमे से निकलने
वाली सुगंध मे धीमा जहर है
जो धीरे - धीरे शरीर मे
जाता रहता है !!और कोई बार
आपने भी महसूस किया होगा इसे
सुघने से गले मे हल्की हल्की जलन होने
लगती है !!
ये जो तीन खतरनाक कैमिकल
डी एथलीन है मेलफो क्वीन है और
फोस्टीन है ! इन पर कंट्रोल
विदेशी कंपनियो का है !
जो आयात कर यहाँ लाकर बेच रहे
है ! और कुछ
स्वदेशी कंपनिया भी इनके साथ
इस व्यपार मे शामिल है !
तो आप से निवेदन है
कभी भी इसका इस्तेमाल न करे !!
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आप कहेंगे फिर मच्छर कैसे भगाये ??
सबसे आसान उपाय है ! आप
मच्छरदानी का प्रयोग करे !
सस्ती है ! स्वदेशी है ! पूर्व से
पश्चिम उत्तर से दक्षिण सब जगह
उपलब्ध है ! और आज कल तो अलग अलग
तरह की मिल रहे है ! एक गोल
प्रकार की है ! एक ऊपर ओढ़ कर सोने
जैसी भी है !!
और इससे भी एक बढ़िया उपाय है !
नीम एक तेल बाजार से ले आए ! और
उसको दीपक मे डाल कर
बत्ती बना कर जला दे ! जबतक
दीपक जलेगा ! एक भी मच्छर आस
पास नहीं फड़केगा !! 40 -50 रुपए
लीटर नीम का तेल मिल
जाता है ! और 2 से 3 महीने चल
जाता है !!
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एक और काम आप कर सकते है ! गाय के
गोबर से बनी दूप या अगरबत्ती ले !
उसको जलाए सब मच्छर भाग
जाएँगे ! आजकल
काफी गौशाला वाले गोबर से
बनी दूप अगरबत्ती आदि बना रहे !
आसानी से आपको उपलब्ध
हो जाएगी !
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और आप अगर ये
अगरबत्ती आदि खरीदेंगे
तो पैसा किसी न
किसी गौशाला को जाएगा !
गौ शाला को पैसा जाएगा !
तो गौ माता की रक्षा होगी !
गौ माता की रक्षा होगी !
तो भारत
माता की रक्षा होगी !!
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वो दूसरे जहर खरीदेंगे तो एक
आपका पैसा बर्बाद और
दूसरा आपका अनमोल शरीर !!

Saturday, March 29, 2014

हिन्दुओ पर मुस्लिम अत्याचार और धर्म निरपेक्ष मीडिया।

पार्ट 3: सितम्बर 14, 1989
BJP के राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्य और जाने माने वकील,
कश्मीरी पंडित, तिलक लाल तप्लू की JKLF ने हत्या कर दी ।
तत्पश्चात जस्टिस नील कान्त गंजू को गोली मार दी गयी।
इसी प्रकार सारे मुख्य कश्मीरी नेताओं की एक एक कर
हत्या कर दी गयी। उसके बाद 300 से अधिक हिन्दू महिलाओ
और पुरुषो की नृशंश हत्या की गयी। एक कश्मीरी पंडित नर्स
जो श्रीनगर के सौर मेडिकल कोलेज अस्पताल में काम
करती थी, का एक भीड़ ने सामूहिक बलात्कार किया और उसके
बाद मार मार कर उसकी हत्या कर दी। यह घिनौना ख़ूनी खेल
चलता रहा और अपने सेकुलर राज्य और केंद्र सरकार,
मीडिया ने कुछ नहीं किया। कुछ भी नहीं।
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पार्ट 4: जनुअरी 4, 1990
आफताब, एक स्थानीय उर्दू अखबार, ने हिज्ब - उल -
मुजाहिदीन की तरफ से एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की -
"सभी हिन्दू अपना सामान बांधें और कश्मीर छोड़ कर चले
जायें" । एक अन्य स्थानीय समाचार पत्र, अल सफा, ने इस
निष्कासन के आदेश को दोहराया। तत्पश्चात मस्जिदों में भारत
एवं हिन्दू विरोधी भाषण दिए जाने लगे।
सभी कश्मीरियों को कहा गया की इस्लामिक ड्रेस कोड अपनाएं।
सिनेमा और विडियो-पार्लर आदि बंद कर दिए गए।
लोगों को कहा गया की वो अपनी घड़ी पाकिस्तान के समय के
अनुसार करे लें। उस समय कश्मीर की फारूक
अब्दुल्ला की सरकार आँखें फेरे चुप बैठी रही ।
अधिक जानकारी के लिए यह लिंक और ब्लॉग आप देख सकते
है:
http://kasmiripandits.blogspot.co.uk/
http://www.rediff.com/news/2005/jan/
19kanch.htm - [19/01/90: When Kashmiri Pandits
fled Islamic terror]
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पार्ट 5: जनुअरी 19, 1990
सारे कश्मीरी पंडितो के घर के दरवाजो पर नोट
लगा दिया जिसमे लिखा था "या तो मुस्लिम बन जाओ
या कश्मीर छोड़ के भाग जाओ या फिर मरने के लिए तैयार
हो जाओ"। पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधान मंत्री बेनज़ीर
भुट्टो ने PTV पर कश्मीरी मुस्लिमों को भारत से आज़ादी के
लिए भड़काना शुरू कर दिया। कश्मीर के सारे मस्जिदों में एक
टेप चलाया गया जिसमे मुस्लिमो को कहा गया की वो हिन्दुओ
को कश्मीर से निकाल बाहर करें या मार डालें । उसके बाद सारे
कश्मीरी मुस्लिम सडको पर उतर आये - ये केवल
आतंकवादी नहीं थे, ये कश्मीर का आम मुस्लिम थे ।
ये वो मुस्लिम थे जिनका कुछ दिन पहले तक हिन्दुओं के साथ
उठाना-बैठना था, मित्रता थी , भाईचारा था । और मारे जाने
वाले ये वो हिन्दू थे जो मुसलमान को अपना भाई समझते थे,
विश्वास करते थे , अपनी पढ़ी-लिखी आधुनिक एवं
धर्मनिरपेक्ष सोच पे गर्व करते थे।
यह मुसलमान कश्मीर पंडितों के घरों में भीड़ बन के घुसे, घर के
पुरुषों को बिठा कर वहीँ उनके सामने उनकी माँ-बेटियों-बहन
ों की एक-एक कर उनके सामने इज्ज़त लूटी , बलात्कार कर
उनके सामने उनके घरवालों की हत्या कर दी, घर
को लोगों सहित जला दिया। कई महिलाओं को लोहे के गरम
सलाखों से मार दिया गया और उनके नग्न शरीर को पेड़ों से
लटका दिया । मासूम बच्चों को स्टील के तार से गला घोटकर
या दीवार पर सर पटक कर मारा। अपनी ऐसी अमानवीय
दुर्गति से बचने के लिए कई कश्मीरी बहनों ने ऊंचे
मकानों की छतों से कूद कर जान दे दी । वे सारे मुस्लिम,
कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या करते रहे और उस पर नारा लगाते
चले गए की उनपर अत्याचार हुआ है और उनको भारत से
आजादी चाहिए!!!
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पार्ट 6: कश्मीरी पंडितो का पलायन
जब इतने खुले नरसंहार के पश्चात भी राज्य अथवा केंद्र से
कोई सहायता नहीं आई तो कश्मीरी पंडितों के पास पलायन के
सिवा कोई रास्ता नहीं बचा । 350 ,000 कश्मीरी पंडित
अपनी जान बचा कर कश्मीर से भाग गए। कश्मीरी पंडित
जो कश्मीर के मूल निवासी है उन्हें कश्मीर छोड़ना पड़ा और तब
भी कश्मीरी मुस्लिम कहते है की उन्हें आजादी चाहिए!!!
यह सब कुछ चलता रहा लेकिन धर्मनिरपेक्ष मीडिया चुप रही-
उन्होंने देश के लोगो तक यह बात कभी नहीं पहुंचाई, इसलिए देश
के लोगों को आज तक पता नहीं चल पाया की क्या हुआ
था कश्मीर में। देश-विदेश के लेखक, तथाकथित बुद्धिजीवी चुप
रहे, भारत का संसद चुप रहा, देश के सारे हिन्दू, मुस्लिम,
सेकुलर चुप रहे। किसी ने भी 350,000 कश्मीरी पंडितो के बारे
में कुछ नहीं कहा।
आज भी अपने देश की मीडिया 2002 के दंगो के रिपोर्टिंग में
व्यस्त है। वो कहते है की गुजरात में मुस्लिम विरोधी दंगे हुए थे
लेकिन यह कभी नहीं बताते की 750 मुस्लिमो के साथ साथ
250 हिन्दू भी मरे थे। यह भी कभी नहीं बताते
की दंगो की शुरुआत मुस्लिमो ने की थी जब उन्होंने 59 हिन्दुओ
को ट्रेन में गोधरा में जिन्दा जला दिया था। कहते हैं की हिन्दुओं
पर अत्याचार की बात की रिपोर्टिंग से अशांति फैलेगी, लेकिन
मुस्लिमों पर हुए अत्याचार की रिपोर्टिंग से अशांति नहीं फैलती।
इसे कहते है सेकुलर (धर्मनिरपेक्ष) पत्रकारिता।
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पार्ट 7: कश्मीरी पंडितो के आज की स्थिति
आज 4.5 लाख कश्मीरी पंडित अपने ही देश में
ही शरणार्थी की तरह रह रहे है। पूरे देश-विदेश में कोई
भी नहीं है उनको देखने वाला। कोई भी मीडिया नहीं है जो उनके
बारे में हुए अत्याचार को बताये। कोई भी सरकार
या पार्टी या संस्था नहीं है जो की विस्थापित
कश्मीरियों को उनके पूर्वजों की भूमि में वापस ले जाने को तैयार
है। कोई भी नहीं इस इस दुनिया में जो कश्मीरी पंडितो के लिए
"न्याय" की मांग करे। कश्मीरी पंडित काफी-पढ़े लिखे लोगों के
तरह जाने जाते थे आज वो नितांत निर्धनों की तरह पिछले २२
सालो से टेंट में रह रहे है। उन्हें मुलभुत सुविधाए भी नहीं मिल
पा रही है, पिने के लिए पानी तक की समस्या है, दूषित नालों के
बीच निर्वाह करने को बाध्य हैं । भारतीय और विश्व मीडिया,
मानवाधिकार संस्थाए आदि गुजरात दंगो में मरे 750
मुस्लिमो की बात करते है (वो भी मारे गए 310 हिन्दुओ
को भूलकर) । लेकिन यहाँ हजारों मारे गए और ४.५ लाख
विस्थापित कश्मीरी पंडितो की बात करने वाला कोई नहीं है
क्योकि वो हिन्दू है। 20 ,000 कश्मीरी हिन्दू तो बस धुप
की गर्मी के कारण मर गए क्योकि वो कश्मीर के ठन्डे मौसम में
रहने के आदि थे।
अधिक जानकारी के लिए यह विडियो आप देख सकते
है: http://www.youtube.com/watch?v=kqSqn0id-IE
[Shocking, Tragic and Horrible story of Kashmiri
Pandits]
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पार्ट 8: कश्मीरी पंडितो और सेना के खिलाफ
मीडिया का षड़यंत्र
आज देश के लोगो को भारतीय मीडिया कश्मीरी पंडितो के
मानवाधिकार-हनन के बारे में नहीं बताती है लेकिन
आंतकवादियों के मानवाधिकार के बारे में अपनी आवाज जरूर
उठाती है । आज सभी को यह बताया जा रहा है की AFSPA
नाम का किसी कानून का भारतीय सेना काफी ज्यादा दुरूपयोग
किया है.. कश्मीर में अलगावादी संगठन मासूम
लोगो की हत्या करवाते है.और भारतीय सेना के जवान जब उन
आतंकियों और उनके सहयोगियों के विरुद्ध कोई करवाई करते
है.. तो यह देशद्रोही अलगावादी नेता अपने बिकी हुए
मीडिया की सहायता से चीखना-चिल्लाना शुरू कर देते हैं की "
देखो हमारे ऊपर कितना अत्याचार हो रहा है " !!!
मित्रो बात यहाँ तक नहीं रुकी है. अश्विन कुमार जैसे कुछ
फिल्म निदेशक "इंशाल्लाह कश्मीर" नामक भारत
विरोधी वृत्तचित्र बना रहे हैं जिससे यह पुरे विश्व
की लोगो को यह दिखा रहे है की कश्मीर के भोले-भाले मुस्लिम
युवाओं पर भारतीय सेना के जवानों ने अत्याचार किया है।
अश्विन कुमार अपने वृत्तचित्र को पूरे विश्व के पटल पर रख
रहे है । हर तरह से देश-विदेश में लोगों को दिखा रहे है
की अन्याय भारतीय सेना ने किया है। जो सच है उसे
वो बिलकुल छिपा दे रहे हैं।
इस विडियो में देखे की किस प्रकार भारतीय सेना के खिलाफ
षड़यंत्र किया जा रहा है: http://www.youtube.com/
watch?v=LofOulSw07k - [Anti Hindu and Anti
Indian Military - Indian Secular Media Exposed!]
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सारे मुस्लिम कहते है मोदी को फांसी दो जबकि मोदी ने गुजरात
की दंगो को समय रहते रोक दिया। आज तक एक भी मुस्लिम
को यह कहते नहीं सुना गया की कांग्रेस के नेताओं, गाँधी परिवार
और अब्दुल्लाह परिवार को फांसी दो।
जो लाखो कश्मीरी पंडितो के नरसंहार को देखते रहे ! मित्रो इस
घटना को अगर आप पढ़ चुके है तो अपने बाकि मित्रो एवं
परिवारजनों को बताएं,शेयर करें, सत्य से अवगत कराएं।
जो कश्मीर में हुआ था वाही आज मुस्लिम-बहुल केरला, पश्चिम
बंगाल, हैदराबाद, उत्तर प्रदेश में हो रहा है। हिन्दुओं पर आज
देश के कई जगहों में अत्याचार हो रहा है। लेकिन सेकुलर
मीडिया इसे दबा देती है इसलिए आपको और हमें कुछ
पता नहीं चल पता है। हमारा या आपका कोई दोष भी नहीं है-
यदि हमें कुछ पता ही नहीं चलेगा तो हम करेंगे क्या? आज
जितनी भी प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया है अधिकाँश
को सउदी अरब से पैसा मिलता है। यह सेकुलर मीडिया हिन्दुओ
के विनाश के बाद ही रुकेगी क्योकि कोई भी हिन्दू संस्था,
पार्टी कभी मीडिया-प्रसार पर ध्यान ही नहीं देती। आज
की सेकुलर मीडिया आधी जिहादियो और आधी कोंग्रेसियों के
नियत्रण में है। हिन्दुओ के साथ हो रहे अत्याचार को बताने के
लिए एक भी टीवी या प्रिंट मीडिया नहीं है। - See more at:
http://oyepages.com/blog/view/id/
51f8b21fbc54b27673000000#sthash
.6TT7jhGQ.dpuf

Saturday, March 22, 2014

मैकाले शिक्षा पद्यति। एक गहरा सडयंत्र

*मैकाले* नाम हम अक्सर सुनते है मगर ये कौन था? इसके उद्देश्य और विचार क्या थे कुछ बिन्दुओं की विवेचना का प्रयास हैं करते. *मैकाले:* मैकाले का पूरा नाम था *थोमस बैबिंगटन मैकाले* .. अगर ब्रिटेन के नजरियें से देखें तो अंग्रेजों का ये एक अमूल्य रत्न था .. एक उम्दा* इतिहासकार, लेखक प्रबंधक, विचारक और देशभक्त* ..इसलिए इसे लार्ड की उपाधि मिली थी और इसे लार्ड मैकाले कहा जाने लगा..अब इसके महिमामंडन को छोड़ मैं इसके एक ब्रिटिश संसद को दिए गए प्रारूप का वर्णन करना उचित समझूंगा जो इसने भारत पर कब्ज़ा बनाये रखने के लिए दिया था...

*२ फ़रवरी १८३५ को ब्रिटेन की संसद में मैकाले की भारत के प्रति विचार और योजना मैकाले के शब्दों में.*.

*" "मैं भारत के कोने कोने में घुमा हूँ..मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी हो ,जो चोर हो, इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है,इतने ऊँचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं,की मैं नहीं समझता की हम कभी भी इस देश को जीत पाएँगे,जब तक इसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है.
और इसलिए मैं ये प्रस्ताव रखता हूँ की हम इसकी पुराणी और पुरातन शिक्षा व्यवस्था,उसकी संस्कृति को बदल डालें,क्युकी अगर भारतीय सोचने लग गए की जो भी बिदेशी और अंग्रेजी है वह अच्छा है,और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है ,तो वे अपने आत्मगौरव और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे और वैसे बनजाएंगे जैसा हम चाहते हैं.एक पूर्णरूप से गुलाम भारत" """*

कई सेकुलर बंधू इस भाषण की पंक्तियों को कपोल कल्पित कल्पना मानते है.. *अगर ये कपोल कल्पित पंक्तिया है, तो इन काल्पनिक पंक्तियों का कार्यान्वयन कैसे हुआ???* सेकुलर मैकाले की गद्दार औलादे इस प्रश्न पर बगले झाकती दिखती है..और कार्यान्वयन कुछ इस तरह हुआ की आज भी मैकाले व्योस्था की औलादे छद्म सेकुलर भेष में यत्र तत्र बिखरी पड़ी हैं..

अरे भाई मैकाले ने क्या नया कह दिया भारत के लिए??,भारत इतना संपन्न था की पहले सोने चांदी के सिक्के चलते थे कागज की नोट नहीं..धन दौलत की कमी होती तो इस्लामिक आतातायी श्वान और अंग्रेजी दलाल यहाँ क्यों आते..लाखों करोड़ रूपये के हीरे जवाहरात ब्रिटेन भेजे गए जिसके प्रमाण आज भी हैं मगर ये मैकाले का प्रबंधन ही है की आज भी हम लोग दुम हिलाते हैं अंग्रेजी और अंग्रेजी संस्कृति के सामने..*हिन्दुस्थान के बारे में बोलने वाला संकृति का ठेकेदार कहा जाता है और घृणा का पात्र होता है इस सभ्य समाज का..*

*शिक्षा व्यवस्था में मैकाले प्रभाव :* ये तो हम सभी मानते है की हमारी शिक्षा व्यवस्था हमारे समाज की दिशा एवं दशा तय करती है..बात १८२५ के लगभग की है..जब ईस्ट इंडिया कंपनी वितीय रूप से संक्रमण काल से गुजर रही थी और ये संकट उसे दिवालियेपन की कगार पर पहुंचा सकता था..कम्पनी का काम करने के लिए ब्रिटेन के स्नातक और कर्मचारी अब उसे महंगे पड़ने लगे थे..
१८२८ में गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक भारत आया जिसने लागत घटने के उद्देश्य से अब प्रसाशन में भारतीय लोगों के प्रवेश के लिए चार्टर एक्ट में एक प्रावधान जुड़वाया की सरकारी नौकरी में धर्म जाती या मूल का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा..
यहाँ से मैकाले का भारत में आने का रास्ता खुला..अब अंग्रेजों के सामने चुनौती थी की कैसे भारतियों को उस भाषा में पारंगत करें जिससे की ये अंग्रेजों के पढ़े लिखे हिंदुस्थानी गुलाम की तरह कार्य कर सकें..इस कार्य को आगे बढाया *जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन के अध्यक्ष थोमस बैबिंगटन मैकाले ने* ....मैकाले की सोच स्पष्ट थी...जो की उसने ब्रिटेन की संसद में बताया जैसा ऊपर वर्णन है..
उसने पूरी तरह से भारतीय शिक्षा व्यवस्था को ख़तम करने और अंग्रेजी(जिसे हम मैकाले शिक्षा व्यवस्था भी कहते है) शिक्षा व्यवस्था को लागु करने का प्रारूप तैयार किया..
*मैकाले के शब्दों में:*
*"हमें एक हिन्दुस्थानियों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना है जो हम अंग्रेज शासकों एवं उन करोड़ों भारतीयों के बीच दुभाषिये का काम कर सके, जिन पर हम शासन करते हैं। हमें हिन्दुस्थानियों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना है, जिनका रंग और रक्त भले ही भारतीय हों लेकिन वह अपनी अभिरूचि, विचार, नैतिकता और बौद्धिकता में अंग्रेज हों"""*
और देखिये आज कितने ऐसे मैकाले व्योस्था की नाजायज श्वान रुपी संताने हमें मिल जाएंगी..जिनकी *मात्रभाषा अंग्रेजी है और धर्मपिता मैकाले..*
इस पद्दति को मैकाले ने सुन्दर प्रबंधन के साथ लागु किया..अब अंग्रेजी के गुलामों की संख्या बढने लगी और जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते थे वो अपने आप को हीन भावना से देखने लगे क्यूकी सरकारी नौकरियों के ठाट उन्हें दीखते थे अपने भाइयों के जिन्होंने अंग्रेजी की गुलामी स्वीकार कर ली..और ऐसे गुलामों को ही सरकारी नौकरी की रेवड़ी बटती थी....
कालांतर में वे ही गुलाम अंग्रेजों की चापलूसी करते करते उन्नत होते गए और अंग्रेजी की *गुलामी न स्वीकारने वालों को अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया*..विडम्बना ये हुए की आजादी मिलते मिलते एक बड़ा वर्ग इन गुलामों का बन गया जो की अब स्वतंत्रता संघर्ष भी कर रहा था..यहाँ भी *मैकाले शिक्षा व्यवस्था चाल कामयाब हुई अंग्रेजों ने जब ये देखा की भारत में रहना असंभव है तो कुछ मैकाले और अंग्रेजी के गुलामों को सत्ता हस्तांतरण कर के ब्रिटेन चले गए*..मकसद पूरा हो चुका था.... अंग्रेज गए मगर उनकी नीतियों की गुलामी अब आने वाली पीढ़ियों को करनी थी...और उसका कार्यान्वयन करने के
लिए थे *कुछ हिन्दुस्तानी भेष में बौधिक और वैचारिक रूप से अंग्रेज नेता और देश के रखवाले* ..(*"नाम नहीं लूँगा क्युकी एडविना की आत्मा को कष्ट होगा)"""*
कालांतर में ये ही पद्धति विकसित करते रहे हमारे सत्ता के महानुभाव..इस प्रक्रिया में हमारी भारतीय भाषाएँ गौड़ होती गयी और हिन्दुस्थान में हिंदी विरोध का स्वर उठने लगा..*ब्रिटेन की बौधिक गुलामी के लिए आज का भारतीय समाज आन्दोलन करने लगा.*.फिर आया उपभोगतावाद का दौर और मिशिनरी स्कूलों का दौर..चूँकि २०० साल हमने अंग्रेजी को विशेष और भारतीयता को गौण मानना शुरू कर दिया था तो अंग्रेजी का मतलब सभ्य होना,उन्नत होना माना जाने लगा..

हमारी पीढियां मैकाले के प्रबंधन के अनुसार तैयार हो रही थी और हम *"भारत के शिशु मंदिरों को सांप्रदायिक कहने लगे क्युकी भारतीयता और वन्दे मातरम वहां सिखाया जाता था."""*..जब से बहुराष्ट्रीय कंपनिया आयीं उन्होंने अंग्रेजो का इतिहास दोहराना शुरू किया और हम सभी सभ्य बनने में उन्नत बनने में लगे रहे मैकाले की पद्धति के अनुसार..
अब आज वर्तमान में *हमें नौकरी देने वाली हैं अंग्रेजी कंपनिया जैसे इस्ट इंडिया थी*..अब ये ही कंपनिया शिक्षा व्यवस्था भी निर्धारित करने लगी और *फिर बात वही आयी कम लागत वाली*, तो उसी तरह का *अवैज्ञानिक व्योस्था *बनाओं जिससे *कम लागत में हिन्दुस्थानियों के श्रम एवं बुद्धि का दोहन* हो सके..
एक उदहारण देता हूँ कुकुरमुत्ते की तरह हैं इंजीनियरिंग और प्रबंधन संस्थान..मगर शिक्षा पद्धति ऐसी है की *१००० इलेक्ट्रोनिक्स इंजीनियरिंग स्नातकों में से शायद १० या १५ स्नातक ही रेडियो या किसी उपकरण की मरम्मत कर पायें *नयी शोध तो दूर की कौड़ी है..
अब ये स्नातक इन्ही अंग्रेजी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के पास जातें है, और जीवन भर की *प्रतिभा ५ हजार रूपए प्रति महीने पर गिरवी रख गुलामों सा कार्य करते है...फिर भी अंग्रेजी की ही गाथा सुनाते है*..
अब जापान की बात करें* १०वीं में पढने वाला छात्र भी प्रयोगात्मक ज्ञान रखता है...किसी मैकाले का अनुसरण नहीं करता.*.
अगर कोई संस्थान अच्छा है जहाँ भारतीय प्रतिभाओं का समुचित विकास करने का परिवेश है तो उसके छात्रों को ये कंपनिया*किसी भी कीमत पर नासा और इंग्लैंड में बुला लेती है और हम मैकाले के गुलाम खुशिया मनाते है* की हमारा फला अमेरिका में नौकरी करता है..
इस प्रकार मैकाले की एक सोच ने हमारी आने वाली शिक्षा व्यवस्था को इस तरह पंगु बना दिया की न चाहते हुए भी हम उसकी गुलामी में फसते जा रहें है..

*समाज व्यवस्था में मैकाले प्रभाव :* अब समाज व्योस्था की बात करें तो शिक्षा से समाज का निर्माण होता है.. शिक्षा अंग्रेजी में हुए तो समाज खुद ही गुलामी करेगा..वर्तमान परिवेश में *MY HINDI IS A LITTLE BIT WEAK* बोलना स्टेटस सिम्बल बन रहा है जैसा मैकाले चाहता था की *हम अपनी संस्कृति को हीन समझे *...
मैं अगर कहीं यात्रा में हिंदी बोल दू,मेरे साथ का सहयात्री सोचता है की ये पिछड़ा है..*लोग सोचते है त्रुटी हिंदी में हो जाए चलेगा मगर अंग्रेजी में नहीं होनी चाहिए.*.और अब हिंगलिश भी आ गयी है बाज़ार में..क्या ऐसा नहीं लगता की *इस व्योस्था का हिंदुस्थानी धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का होता जा रहा है.*...अंग्रेजी जीवन में पूर्ण रूप से नहीं सिख पाया क्यूकी बिदेशी भाषा है...और हिंदी वो सीखना नहीं चाहता क्यूकी बेइज्जती होती है...
हमें अपने बच्चे की पढाई अंग्रेजी विद्यालय में करानी है क्यूकी दौड़ में पीछे रह जाएगा..*माता पिता भी क्या करें बच्चे को क्रांति के लिए भेजेंगे क्या???* क्यूकी आज अंग्रेजी न जानने वाला बेरोजगार है..*स्वरोजगार के संसाधन ये बहुराष्ट्रीय कंपनिया ख़तम* कर देंगी फिर गुलामी तो करनी ही होगी..तो क्या हम स्वीकार कर लें ये सब?? या हिंदी पढ़कर समाज में उपेक्षा के पात्र बने????
*शायद इसका एक ही उत्तर है हमे वर्तमान परिवेश में हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित उच्च आदर्शों को स्थापित करना होगा..हमें विवेकानंद का "स्व" और क्रांतिकारियों का देश दोनों को जोड़ कर स्वदेशी की कल्पना को मूर्त रूप देने का प्रयास करना होगा""*..चाहे भाषा हो या खान पान या रहन सहन पोशाक...
अगर मैकाले की व्योस्था को तोड़ने के लिए मैकाले की व्योस्था में जाना पड़े तो जाएँ ....*जैसे मैं अंग्रेजी गूगल का इस्तेमाल करके हिंदी लिख रहा हूँ..*
क्यूकी कीचड़ साफ करने के लिए हाथ गंदे करने होंगे..हर कोई छद्म सेकुलर बनकर सफ़ेद पोशाक पहन कर मैकाले के सुर में गायेगा तो आने वाली पीढियां हिन्दुस्थान को ही मैकाले का भारत बना देंगी.. उन्हें किसी ईस्ट इंडिया की जरुरत ही नहीं पड़ेगी गुलाम बनने के लिए..और शायद हमारे आदर्शो राम और कृष्ण को एक कार्टून मनोरंजन का पात्र....

आइये एक बार गुनगुनाये भारतेंदु जी को...
बोलो भईया दे दे तान..
हिंदी हिन्दू हिन्दुस्थान........

जय हिंद...