Sunday, January 31, 2016

ये विकास है या विनाश

लेख लम्बा जरूर है पर जन जागृति के लिए अत्यंत आवश्यक है, निवेदन है एक बार समय निकाल कर पढ़ें और यदि ठीक लगे तो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाएं...

क्या खाओगे रोटी या कंप्यूटर ?
खाने के लिए रोटी की ज़रूरत होती है कंप्यूटर की नहीं??
आप लोग सोच रहे हैं ये क्या पागलपन की बात लिखी है कोई कंप्यूटर कब खाता या खिलाता है !
इसे आगे पढिये आप खुद जान जायेंगे क्या हो रहा है इस देश में ! जैंसा की हम सभी जानते हैं के हमारा देश हमेशा से कृषि प्रधान रहा है और हमारी देश का आधे से ज्यादा धन या अर्थव्यवस्था कृषि से ही आती है ! पर आज हमें खाने की चीज़े महंगे दामो पर मिल रही है ! लगभग हर फल या सब्जी में मिलावट है यहाँ तक के गाए के दूध तक में मिलावट ! जो फल या सबजिया पहले कभी हम मुफ्त में बाट दिया करते थे आज खरीद कर नहीं मिल रही क्यों ??????
इसका कारण जानना चाहते हैं :- ये एक बहुत बड़ा मुद्दा और समस्या है जिसे आज में उठा रहा हूँ , इसलिए ध्यान से पढियेगा इसे क्योंकि अगर आज इस चीज़ पर देश में ध्यान नहीं दिया गया तो हमारा सारा देश साथ ही कई पडोसी देश भी, जो एसा कर रहे हैं, भूखे मर जायेंगे |
ये सब किसी पार्टी के कारण नहीं हमारी सोच के कारण हो रहा है ! हम देश की तरक्की के नाम पर अपना ही नुकसान कर रहे हैं और ये ऐसे हो रहा है, के ये सारे बड़े बिल्डर्स ने अपना काम शहरों में पूरा कर लिया अब उनका धंधा शहर में खत्म होने लगा , तो उन्होंने गाँव का रुख किया है | आज सारे बड़े शहर चाहे वो मुंबई, पुणे हो या बंगलोर और दिल्ली सब आस पास के छोटे छोटे गाँव से मिलकर बने हैं, और सारे गाँव में किसानो की जमीनों को बिल्डर्स ने लालच देकर या डरा धमकाकर खरीद लिया और नेताओं ने भी तरक्की और विकास के नाम पर खेतो को ख़त्म करके वह बिल्डिंग्स बनाने दी और धीरे धीरे भारत के खेत ख़त्म होने लगे न ही सिर्फ खेत साथ ही किसान भी क्योंकि .....
हमारी गन्दी सोच है के जो सूट पहना है या tie लगाया है वो महान है और ज्ञानवान है और धोती पहनने वाले लोग मुर्ख है बस इसी सोच के कारण आज किसान अपने बेटों को किसान नहीं बना रहे बल्कि इंजीनियर या डोक्टर बना रहे हैं और वो सभी बाद मे बेरोजगार घूमते हैं ???
हर किसान आज शहर जाके कंप्यूटर और लैपटॉप और सूट लेना चाहता है और खेत में काम नहीं करना चाहता क्योंकि हम उसे वह सम्मान नहीं देते!
एक गरीब किसान जो अपने दिन रात एक करके हमारे लिए फसल उगाता है अनाज उगाता है, हम उसे इज्ज़त नहीं देते यहाँ तक के बस या ट्रेन में अपने पास तक नहीं बैठने देते और कोई कंप्यूटर इंजिनियर या सूट पहना MBA हो जो कंप्यूटर या लैपटॉप लिया हो ,उसके पास सब बैठते और चाहे वो कितना भी गधा हो उसकी इज्ज़त हैं | जबकि वह या तो आपको ख़राब सामान बेचकर जा रहा है या विदेशी कंपनी को भारत का धन लूट कर भेज रहा है, तब भी किसान से ज्यादा इज्ज़त उसे देंगे क्योंकि वह अंग्रेजो वाले कपडे पहनता है ना ??????
वाह शर्म आनी चाहिए हमे अपने आप पर .......
क्या सिर्फ सूट पहनने या शहर में रहने से ही ज्ञान आता है , अरे हमारे देश में तो 'सादा जीवन उच्च विचार' की संस्कृति है , और लाखों वर्षो से यहाँ के साधू-संत जंगलों में ज्ञान प्राप्त करते आये है, किसी विदेशी स्कूल में या शहर में नहीं , बल्कि उन महान ऋषियों ने हमेशा इन बेवकूफ शहर वालों को ज्ञान दिया है , आज हम जिस अमेरिका का अनुसरण कर रहे हैं वहां आज भी विवेकानंदा के और महिर्षि योगी या ओशो या बाबा रामदेव के कई चेले हैं, किसी भारतीय mba के नहीं क्यों????
क्योंकि ज्ञान सिर्फ computer चलाना और अंग्रेजी आना नहीं होता , और अगर इन पड़े लिखे लोगो को इनकी पढाई का ज्ञान है तो किसानो को भी धर्म का इंसानियत का फसल कब उगानी है कब लगानी है इन सबका ज्ञान है , आयर्वेद का ज्ञान हे , प्रकर्ति का ज्ञान हे !!!
पर आज विकास की इस अंधी दौड़ में हम खेती की जमीनों पर कब्ज़ा करकर शोपिंग मोल और बिल्डिंग बना रहे हैं , जिससे एक दिन सभी किसान ख़त्म हो जायेंगे ?????????
इसीलिए मैंने कहा था जब किसान ख़त्म हो जायेंगे तो रोटी और अन्न ख़त्म हो जायेगा और तब खाना लैपटॉप और कंप्यूटर !
और तब लैपटॉप आएंगे २ रुपये में और रोटी १ लाख में क्योंकि laptop के बिना इन्सान जी सकता है पर रोटी के बिना नहीं| आज जनसँख्या इतनी बढ गई है के किसान को बढ़ावा मिलना चाहिए और खाने की वस्तुओं का उत्पादन और बढना चाहिए बल्कि हो उल्टा रहा है ! किसान कम हो रहे हैं वाह क्या विकास हो रहा है !
कुछ समय पहले की बात है गुडगाँव के सारे किसानो ने जमीने बिल्डर्स को बेच दी और dlf और कई बड़ी कंपनियों ने वहां बिल्डिंगे बना दी अब वो बेचारे नासमझ किसान जो अनपड़ हे , जब तक पैसा खर्च नहीं होता तब तक ऐश से रहेंगे बाद में भूखे मरेंगे और बिल्डर्स ने तो अपना काम निकाल लिया ,लेकिन उस हरयाणा की ज़मीन पर या नॉएडा के पास उत्तर प्रदेश की ज़मीन पर ,या महाराष्ट्र में मुंबई और पुणे के किसानो की ज़मीन पर जो खेत थे जो अन्न उगता था , सब ख़त्म, लाखो लोगो को जहा से अनाज मिल सकता था आज सब ख़त्म,........ अब खाओ शौपिंग माल और इंजीनियरिंग कालेज ??
और सबसे ज्यादा डर की बात अब यही हे के अब यही सब छोटे प्रदेशों में भी होने लगा है मध्य प्रदेश में हो रहा है आज, भोपाल और इंदौर के पास की सारी ज़मीने बिल्डर्स ने खरीद ली और यहाँ इंजीनियरिंग कॉलेज बना रहे है या कॉलोनियां बसा रहे हैं इसी तरह चलता रहा तो एक दिन सारे किसान मरेंगे फिर उनके बच्चे मरेंगे और फिर वो लोग जिन्हें खाने नहीं मिलेगा , और फिर ..............हम सब !
ये बिल्डर्स और नेता तो करोरो रुपये लेकर निकल जायेंगे यहाँ से विदेश पर हम सबका क्या होगा?? क्या होगा इस देश की १०० करोड़ से ज्यादा जनता का ये हमें सोचना है !!!!
और यही मेरी चिंता का विषय है..................
हमे किसानो को रोकना होगा ज़मीने बेचने से उन्हें उनकी खोई इज्ज़त वापस दिलाना होगी, जिस तरह लाल बहादुर शास्त्री ने नारा दिया था जय जवान जय किसान, वैसे ही और किसानो को समझाना होगा, अपने बच्चो को किसान ही बनाये उन्हें सारी चीज़े हम गाँव में ही मुहैया करवाएंगे और उन्हें पढ़ाएंगे भी और इज्ज़त भी देंगे और इन धोखेबाज़ और खुनी बिल्डर्स को रोकना होगा वरना ताकत और पैसे के नशे में चूर ये सारे देश को या तो विदेशियों के हाथों में बेच देंगे या बर्बाद कर देंगे और बना देंगे किसानो की लाशों पर बड़ी बड़ी इमारते !!
खेत और हरियाली ख़त्म होने से कई संकट है :-
1)हम और हमारे किसान भूखे मरेंगे |
2) global warming बढ़ेगी, पर्यावरण का नाश हो जायेगा |
3) हमारी अर्थ व्यवस्था डूब जाएगी क्योंकि खेती पर निर्भर है |
4)और हमे विदेशों से खाने की वस्तुए मंगनी होगी सोचो जब वो लोग पेट्रोल और डीसल जिसके बिना हम जीवित रह सकते हैं इतना महंगा देते हैं हमे क्योंकि वो हमारे पास नहीं है और उनके पास है तो .......
हमे खाना कितना महंगा देंगे ......सारे गरीब मर जायेंगे भुखमरी बढेगी
और जो अमेरिका हमें जंग के समय हथियार देने पर या पैसा उधार देने पर इतनी शर्ते लगा देता है सोचो जब खाना मांगना पड़ गया तब कैसी शर्ते माननी पड़ेगी ....
यदि वो बोले गुलाम बन जाओ तो ....................शायद
इसे रोकना होगा ..........हम लोग इस दिशा में जनजाग्रति का कार्य कर रहे हैं , आप भी सहयोग करे और भारत के हर जिले में किसानो को समझाए और लोगो को क्योंकि अकेला किसान इन बड़े बिल्डर्स और कॉर्पोरेट घरानों से नहीं लड़ सकता जनता को उनका साथ देना होगा और रोकना होगा हमें अपने भ्रष्ट नेताओं को जो किसानो की या सरकारी जमीनों का सौदा चंद रुपये खा कर कर देते है ?????????????
जब भी आपके शहर में नयी कालोनी बन रही हो या शहर के बाहर कुछ कालेज या शौपिंग माल बन रहा हो !!!!!! तो एक बार सोचियेगा जरुर के ये विकास हो रहा है या विनाश हमेशा ये याद रखे "खाने के लिए रोटी की ज़रुरत होती है कंप्यूटर या लैपटॉप की नहीं"
और खेती के लिए जमीन की ज़रूरत होती हे शोपिंग माल की नहीं।
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Friday, January 8, 2016

फ्री बेसिक्स "A Big Fraud"

फ्री बेसिक्स के पिंजड़े में फ्री डाटा की मूंगफली।
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बंदरो को पकड़ने के लिए शिकारी पिंजड़े में मूंगफलियां रख देते है तथा सलाखों के बीच गेप इतना ही रखा जाता है कि बन्दर का खाली हाथ तो पिंजड़े के भीतर जा सके किन्तु मुट्ठी बाहर न आ सके। बन्दर अपना हाथ सलाखों के अंदर डाल कर पिंजड़े में रखी मूंगफली मुट्ठी में पकड़ लेता है, और उसका हाथ पिंजड़े में फंस जाता है। यदि बन्दर मूंगफली का लालच छोड़ दे तो मुट्ठी खुल जायेगी और वह आजाद हो जाएगा। लेकिन हर बार बन्दर मूंगफली को पकडे रहना ही चुनता है, और शिकारी द्वारा पकड़ा जाता है !!  
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कई फेसबुक यूजर आजकल 'SEND EMAIL' का ऑप्शन क्लिक करके फेसबुक की महत्त्वाकांक्षी योजना 'फ्री बेसिक्स' को भारत में लागू करवाने में सहयोग कर रहे है। यूजर द्वारा 'SEND EMAIL' क्लिक करने से ट्राई (TRAI) के पास यह मेल जाता है कि ईमेल भेजने वाला फ्री-बेसिक्स का समर्थन करता है। साथ ही ईमेल भेजने वाले की मित्र सूची के सभी मित्रो को भी यह नोटिफिकेशन जाता है कि अमुक यूजर ने "भारत में नेट न्युट्रिलिटी को बनाये रखने के लिए फ्री बेसिक्स के समर्थन में मेसेज भेजा है, अत: आप भी भेजे"।
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चूंकि फ्री-बेसिक्स फेसबुक को बेहद मुनाफ़ा और भारत के नागरिको को भारी घाटा देने वाली योजना है, अत: मेल में अन्य विवरण और यूजर का नाम भरकर फॉर्मेट प्रस्तुत करने का काम फेसबुक खुद कर दे रहा है, और यूजर को मेल भेजने के लिए सिर्फ एक क्लिक करना होता है।
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मुझे नहीं पता कि ऐसा क्लिक करने वाले यूजर्स में से कितने व्यक्ति यह जानते है कि उन्होंने असल में भारत में नेट न्युट्रिलिटी को ख़त्म करने के लिए ट्राई को  ईमेल भेज दिया है, या कितनो ने ईमेल के कंटेंट को पढ़ा है या कितने फ्री-बेसिक्स की नीति से वाकिफ है। लेकिन कई गंभीर कार्यकर्ताओ द्वारा भी भेजे गए ईमेल के नोटिफिकेशन प्राप्त होना अप्रत्याशित है। 
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क्या है फ्री-बेसिक्स ?
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यदि चर्च आदिवासी इलाको में अपने केम्प लगाकर खाना और कम्बल वितरित करे तो क्या आप उसे ऐसा करने देंगे !! आप क्यों नहीं करने देंगे, जबकि साफ़ है कि पादरी गरीबो को फ्री में खाना खिला रहा है ? आप ऐसा नही करने देंगे,  क्योंकि आप जानते है कि यह फ्री नही है और पादरी धर्मांतरण के लिए मुफ्त में खाना और कम्बल परोस रहा है। सभी जानते है कि दुनिया में 'फ्री' कुछ नही होता। फ्री बेसिक्स भी फ्री नही है, बल्कि आगे जाकर बहुत महंगी पड़ने वाली है। 
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फेसबुक यह मिथ्या प्रचार कर रहा है कि फ्री-बेसिक्स भारत में नेट न्युट्रलिटी को बनाये रखने के लिए है, जबकि सच्चाई यह है कि फ्री-बेसिक्स नेट न्युट्रिलिटी को ख़त्म कर देगा। फ्री-बेसिक्स में बेसिक्स क्या है इसका फैसला फेसबुक करेगा, अत: जिस सामग्री या वेबसाइट को फेसबुक 'बेसिक्स' की श्रेणी में नहीं रखेगा, यूजर्स उन्हें देखने से वंचित हो जाएंगे। 
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फ्री-बेसिक्स के अन्तर्गत फेसबुक भारत के नागरिको को बेहद कम कीमत में या लगभग मुफ्त सेलफोन डिवाइस बांटने की स्कीम लांच कर सकेगा, या लगभग सभी को 2G, 3G का वायरलाइन कनेक्शन 'फ्री' दिया जाएगा। इस फोन से यूजर्स कॉल तो कर सकेंगे, किन्तु इस फोन या इस कनेक्शन पर 'सिर्फ' उन वेबसाइटों को ही देखा सकेगा जो फ्री-बेसिक्स से जुडी हुई हो, मतलब जिनका फेसबुक से एग्रीमेंट हो। यानी जो कम्पनिया फेसबुक, टेल्को या अन्य किसी टेलीकॉम कंपनी को पैसा दे रही है, उन्ही को उपभोक्ता इंटरनेट पर एक्सेस कर सकेंगे। इस तरह एक विदेशी कम्पनी यह तय करेगी कि क्या बेसिक है, और यह भी कि, इंटरनेट पर आप क्या देखेंगे।
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तो अगर फेसबुक जनता को फ्री इंटरनेट दे रहा है तो समस्या क्या है ?

समस्या यह है कि यदि फेसबुक फ्लिप कार्ट को फ्री बेसिक्स योजना से बाहर करता है किन्तु अमेजन को शामिल कर लेता है तो इस फ्री इंटरनेट पर उपभोक्ता सिर्फ अमेजन की वेबसाइट ही खोल सकेंगे। अत: ऑनलाइन बिजनेस पर अमेजन का एकाधिकार हो जाएगा और अन्य सभी कंपनियां घटते ग्राहकों की संख्या के कारण बंद हो जायेगी। एक बार एकाधिकार होने के बाद अमेजन ग्राहकों से मनमाने दाम वसूल सकेगी और ई-कॉमर्स में प्रतिस्पर्धा के कारण मिल रहे डिस्काउंट के दिन हवा हो जाएंगे। फेसबुक द्वारा दिए गए फ्री इंटरनेट के कारण यूजर्स किसी नई वेबसाइट को देखने के लिए अलग से रिचार्ज नही करवाएंगे।   इसीलिए फ्री-बेसिक्स को वे बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनिया फाइनेंस कर रही है जो स्थानीय कम्पनियो को बाजार से बाहर करना चाहती है। हमेशा के लिए।
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इससे सब से ज्यादा विस्तार फेसबुक को मिलेगा, क्योंकि फेसबुक यूज़रबेस कंपनी है और भारत में उसका कोई प्रतिद्वंदी नहीं है। किन्तु फेसबुक को वित्तीय की जगह राजनैतिक फायदा अधिक होगा, जो कि भारी वित्तीय मुनाफा कमाने के मार्ग खोल देगा।
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जहां तक मौद्रिक लाभ कमाने की बात है, सबसे अधिक मुनाफा फ्लिपकार्ट और अमेजन कमाएगी। लेकिन जल्दी ही अमेरिकी कम्पनिया फ्लिपकार्ट को टेक ओवर कर लेगी अत: भारत के पूरे ई-रिटेल बाजार पर अमेरिकी कम्पनियो का एकाधिकार हो जाएगा।
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इस तिकड़म का नाम जुकेरबर्ग ने फ्री-बेसिक्स रख छोड़ा है, और वे दिन दहाड़े यह एलान चला रहे है कि फ्री-बेसिक्स नेट न्युट्रिलिटी को कायम रखेगा। बल्कि वे तो यह भी कह रहे है कि इससे भारत में नेट न्युट्रिलिटी आ जायेगी। और भारत में नेट न्युट्रिलिटी लागू करने की जुकेरबर्ग को इतनी चिंता है कि वे दिन रात भारत के नागरिको को समझा रहे है कि भारत में नेट न्युट्रिलिटी स्थापित करने के लिए ट्राई को ईमेल करो। यहां तक की उन्होंने ईमेल भेजने का सॉफ्टवेयर भी बना दिया है और सभी फेसबुक यूजर्स की वाल पर ट्राई को मेसेज भेजने की अपील भी भेज रहे है !!! इस लिहाज से तो, नेट न्युट्रिलिटी को बचाने के लिए इन्हे भारत रत्न मिल जाना चाहिए !
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कुछ मिथ्या प्रचार की चपेट में आकर और कुछ सोनिया-मोदी-केजरीवाल की अंधभक्ति के वशीभूत होकर यूजर्स ट्राई को ईमेल भी भेज रहे है कि फ्री-बेसिक्स को लागू किया जाए। ज्ञातव्य है कि सोनिया घांडी, मोदी साहेब और केजरीवाल जी फ्री-बेसिक्स का समर्थन कर रहे है, अत: इनके अंध भगत भी देश हित की उपेक्षा करते हुए सोशल मिडिया पर फ्री-बेसिक्स के समर्थन में अभियान चला रहे है।
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मुफ्त इंटरनेट बांटने के लिए विदेशी कंपनी को अनुमति देने के बाद शायद सोनिया-मोदी और केजरीवाल भारत को शिक्षित बनाने के लिए 'एजुकेट इण्डिया' नाम से एक नया अभियान प्रारम्भ करेंगे जिसमे मिशनरीज के पादरियों को बड़े पैमाने पर स्कूल खोलने और भारतीयों को मुफ्त शिक्षा देने के लिए आमंत्रित किया जाएगा !!
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समाधान ???
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हम बीएसएनएल चेयरमेन से मांग कर रहे है कि भारत के सभी 100 करोड़ नागरिको को बीएसएनएल की तरफ से एक मोबाईल फोन, महीने का एक जीबी डाटा, एक सिम, महीने का 50 रू बेलेंस और 100 एसएमएस "फ्री" दिया जाए।
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ये जायज मांग है क्योंकि ----

१) इंटरनेट अब हर व्यक्ति के लिए आवश्यकता बन चुका है, और डिजिटल इण्डिया तभी सफल होगा जब भारत के प्रत्येक नागरिक की पहुँच इंटरनेट तक होगी। ये पहुंच फेसबुक द्वारा नही बल्कि भारत सरकार द्वारा बनायी जानी चाहिए।
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२) 2000 रू प्रति मोबाइल की दर से 100 करोड़ मोबाइल के लिए सिर्फ 2 लाख करोड़ रूपये की आवश्यकता है, जबकि हाल ही में मोदी साहेब कॉर्पोरेट जगत का 2 लाख करोड़ का टैक्स माफ़ कर चुके है। उतने में तो सभी 100 करोड़ नागरिको को मोबाइल की सुविधा मिल जायेगी। 
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३) सभी नागरिको को एक सिम दी जायेगी जिसका नंबर उसकी मतदाता संख्या के आधार पर रजिस्टर्ड किया जाएगा।
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४) 100 एसएमएस होने से नागरिक अपने सांसदों को गैजेट में प्रकाशित करने के लिए आवश्यक कानूनो के आदेश अपने रजिस्टर्ड मोबाइल से एसएमएस द्वारा भेज सकेंगे।
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५) हर महीने 100 करोड़ जीबी डेटा की जरुरत होगी, जो कोई समस्या की बात नहीं है। हमारे ही टैक्स से इसरो ने उपग्रह बनाकर ऊपर भेज के रखे है। अत: इस डेटा पर प्रथम अधिकार भारत के नागरिको का है। ये डेटा ए राजा और सोनिया घांडी ने घूस खाकर औने पौने दामो में बेच दिया, और हम अब टेलीकॉम कम्पनियो को इस डेटा के लिए ऊँचे दाम चुका रहे है।  
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ये मांग भारत के करोडो नागरिको के हित में है, पर क्योंकि इससे टेलीकॉम कंपनियों को घाटा होगा, इसलिए बीएसएनएल चेयरमेन इस मांग को मान नही रहा, और मोदी साहेब भी इस मांग का विरोध कर रहे है। भारत के नागरिको के पास यदि बीएसएनएल चेयरमेन को नौकरी से निकालने का अधिकार हो तो इस मांग को लागू कराया जा सकता है।
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भारत में नेट न्युट्रिलिटी को बचाये रखने के लिए आप क्या कर सकते है ?
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(1) ट्राई को वो ईमेल न भेजे जिसे भेजने की अपील फेसबुक बार बार कर रहा है।
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(2) नेट न्युट्रिलिटी को बनाये रखने के लिए अपने सांसद को यह एसएमएस भेजे---https://web.facebook.com/pawan.jury/posts/820005808117657
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(3) अपने सांसद को एसएमएस द्वारा आदेश भेजे की टीसीपी* क़ानून को गैजेट में प्रकाशित किया जाए।

टीसीपी के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
www.facebook.com/pawan.jury/posts/809753852476186

टीसीपी क़ानून के गैजेट में प्रकाशित होने से नागरिको की सहमति से राईट टू रिकॉल बीएसएनएल अध्यक्ष के क़ानून को गैजेट में प्रकाशित किया जा सकेगा। यदि बीएसएनएल अध्यक्ष को नौकरी से निकालने का अधिकार नागरिको को मिल जाता है, तो बीएसएनएल अध्यक्ष देश के सभी नागरिको को एक मोबाइल फोन और हर महीने 1 जीबी डाटा उपलब्ध करवाएगा, वरना हम नागरिक राईट टू रिकॉल क़ानून का प्रयोग करके उसे नौकरी से निकाल देंगे।
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*टीसीपी क़ानून के लिए अपना समर्थन आप http://www.bhilwarasms.in/ पर एसएमएस भेज कर दर्ज करवा सकते है।  
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**नागरिको से आग्रह है कि, सोनिया-मोदी-केजरीवाल के अंध भक्तो के भुलावे में आकर ट्राई को ईमेल न भेजे, बल्कि अपने सांसद को ऊपर दिए गए आदेश भेजे, ताकि देश में नेट न्युट्रिलिटी कायम रह सके।

Via Whatsapp.

Sunday, December 20, 2015

नया साल किसने बनाया और कैसे ?

1 जनवरी नव वर्ष न ही वैज्ञानिक है न ही सनातन धर्मियों को शोभनीय।

हिन्दू सनातन धर्मियों के नव वर्ष को अप्रैल फूल से प्रचारित करने वाले इन ईसाईयों के येशु के खतने की दिवस है 1 जनवरी ।

क्या आप येशु के खतने के दिन को नव वर्ष का शुभारम्भ मानते हो ?

क्या आप हिन्दू पंचांग के नव वर्ष को अप्रैल फूल मानते हो ?

जानिये असली इतिहास

वंदेमातरम् ।

नया साल किसने बनाया और कैसे ? http://bharatsamachaar.blogspot.com/2014/12/blog-post_30.html

नए साल का सच

पढिऐ फिर HAPPY NEW YEAR मना लेना ..

ना तो जनवरी साल का पहला मास है और ना ही 1 जनवरी पहला दिन ..

जो आज तक जनवरी को पहला महीना मानते आए है वो जरा इस बात पर विचार करिए ..

सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर क्रम से 7वाँ, 8वाँ, नौवाँ और दसवाँ महीना होना चाहिए जबकि ऐसा नहीं है .. ये क्रम से 9वाँ,10वाँ,11वां और
बारहवाँ महीना है .. हिन्दी में सात को सप्त, आठ को अष्ट कहा जाता है, इसे अग्रेज़ी में sept(सेप्ट) तथा oct(ओक्ट) कहा जाता है .. इसी से september तथा October बना ..

नवम्बर में तो सीधे-सीधे हिन्दी के "नव" को ले लिया गया है तथा दस अंग्रेज़ी में "Dec" बन जाता है जिससे
December बन गया ..

ऐसा इसलिए कि 1752 के पहले दिसंबर दसवाँ महीना ही हुआ करता था। इसका एक प्रमाण और है ..

जरा विचार करिए कि 25 दिसंबर यानि क्रिसमस को X-mas क्यों कहा जाता है????
इसका उत्तर ये है की "X" रोमन लिपि में दस का प्रतीक है और mas यानि मास अर्थात महीना .. चूंकि दिसंबर दसवां महीना हुआ करता था इसलिए 25 दिसंबर दसवां महीना यानि X-mas से प्रचलित हो गया ..

इन सब बातों से ये निष्कर्ष निकलता है
की या तो अंग्रेज़ हमारे पंचांग के अनुसार ही चलते थे या तो उनका 12 के बजाय 10 महीना ही हुआ करता था ..

साल को 365 के बजाय 305 दिन
का रखना तो बहुत बड़ी मूर्खता है तो ज्यादा संभावना इसी बात की है कि प्राचीन काल में अंग्रेज़ भारतीयों के प्रभाव में थे इस कारण सब कुछ भारतीयों जैसा ही करते थे और इंगलैण्ड ही क्या पूरा विश्व ही भारतीयों के प्रभाव में था जिसका प्रमाण ये है कि नया साल भले ही वो 1 जनवरी को माना लें पर उनका नया बही-खाता 1 अप्रैल से शुरू होता है ..

लगभग पूरे विश्व में वित्त-वर्ष अप्रैल से लेकर मार्च तक होता है यानि मार्च में अंत और अप्रैल से शुरू..

भारतीय अप्रैल में अपना नया साल मनाते थे तो क्या ये इस बात का प्रमाण नहीं है कि पूरे विश्व को भारतीयों ने अपने अधीन रखा था।

इसका अन्य प्रमाण देखिए-अंग्रेज़
अपना तारीख या दिन 12 बजे
रात से बदल देते है .. दिन की शुरुआत सूर्योदय से होती है तो 12 बजे रात से नया दिन का क्या तुक बनता है ??

तुक बनता है भारत में नया दिन सुबह से गिना जाता है, सूर्योदय से करीब दो-ढाई घंटे पहले के समय को ब्रह्म-मुहूर्त्त की बेला कही जाती है और यहाँ से नए दिन की शुरुआत होती है.. यानि की करीब 5-5.30 के आस-पास और
इस समय इंग्लैंड में समय 12 बजे के आस-पास का होता है।

चूंकि वो भारतीयों के प्रभाव में थे इसलिए वो अपना दिन भी भारतीयों के दिन से मिलाकर रखना चाहते थे ..

इसलिए उन लोगों ने रात के 12 बजे से ही दिन नया दिन और तारीख बदलने का नियम अपना लिया ..

जरा सोचिए वो लोग अब तक हमारे अधीन हैं, हमारा अनुसरण करते हैं,
और हम राजा होकर भी खुद अपने अनुचर का, अपने अनुसरणकर्ता का या सीधे-सीधी कहूँ तो अपने दास का ही हम दास बनने को बेताब हैं..

कितनी बड़ी विडम्बना है ये .. मैं ये नहीं कहूँगा कि आप आज 31 दिसंबर को रात के 12 बजने का बेशब्री से इंतजार ना करिए या 12 बजे नए साल की खुशी में दारू मत पीजिए या खस्सी-मुर्गा मत काटिए। मैं बस ये कहूँगा कि देखिए खुद को आप, पहचानिए अपने आपको ..

हम भारतीय गुरु हैं, सम्राट हैं किसी का अनुसरी नही करते है .. अंग्रेजों का दिया हुआ नया साल हमें नहीं चाहिये, जब सारे त्याहोर भारतीय संस्कृति के रीती रिवाजों के अनुसार ही मानते हैं तो नया साल क्यों नहीं?

वंदेमातरम् ।

यह लेख नवनीत सिंघल जी के ब्लॉग से लिया गया है।

नया साल किसने बनाया और कैसे ? http://bharatsamachaar.blogspot.com/2014/12/blog-post_30.html